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“UN में हमने साबित कर दिखाया की मुस्लिम एक होकर क्या नही कर सकते हैं”

इस्तांबुल– जेरुसलम को लेकर पिछले काफी हफ़्तों से जारी कशमकश में आखिरकार सच की ही जीत हुई और दुनियाभर के देशों ने एक तरफ़ा मतदान से साबित कर दिया की वो सच के ही साथ रहेंगे. 128 के मुकाबले पड़े 9 वोटो से दो बातें सामने आती हैं. पहली यह की अमेरिका की सुपरपॉवर वाली डंडागिरी से बाकी देशों की अर्थव्यवस्था पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता और अधिकतर देश इस बात से अजिज आ चुके हैं वहीँ दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह की चाइना और रूस दो बड़ी शक्ति बन चुकी है और सीनाताने अमेरिका के सामने खड़ी हैं, सीरिया में जिस तरह परदे के पीछे चल रही अमेरिका और रूस की लड़ाई ने यह साबित कर दिखाया है की रूस अकेले दम पर अमेरिका को रोकने की कुव्वत रखता है वहीँ चीन की लगातार बढ़ती शक्ति के आगे भी अमेरिका नतमस्तक दिखा, शायद यही वजह थी जिस कारण उत्तर कोरिया के साथ अमेरिका बिनाशर्त बात करने को राज़ी हो गया.

वहीँ इन दोनों बातों के बीच एक और कड़ी निकलकर सामने आती है जिस कारण अमेरिका अधिक व्याकुल दिख रहा है, चीन तथा रूस के मुकाबले क्षीण साबित करने के लिए ज़रूरत एक मुद्दे की, जो जेरुसलम बनकर सामने आया. इसी मुद्दे पर सभी मुस्लिम देशों के एक हो जाना और उनके बेकसपोर्ट में चीन तथा रूस का आजाना इस बात को साबित करता है की अगर सभी मुस्लिम राष्ट्र एक सुर में बोले तो अमेरिका के धुरविरोधी देश उसके पक्ष में नज़र आएंगे. ऐसा ही कुछ यूनाइटेड नेशन में देखने को मिला.

हालाँकि इस मामले में अमेरिका और इसराइल को निराशाजनक हार दिलवाने में अगर किसी नेता की छवि एक ‘हीरो’ के रूप में उभरी है तो वह निसंदेह तुर्की के राष्ट्रपति तैय्यप एर्दोगान ही हैं. जिनकी मुस्लिम देशों की एक करने की अथक मेहनत यूनाइटेड नेशन में साफ़ नज़र आई, हालाँकि कुछ अरब देशों को लेकर सन्देश प्रकट किया जा रहा था लेकिन मुस्लिम एकता को देखते हुए उन्होंने भी खिलाफत उस्मानिया के झंडे के नीचे कदम मिलकर चलना शुरू कर दिया.

तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैय्यब एर्दोगान ने कहा कि जेरुसलम के मामले में सयुंक्त राष्ट्र के नतीजे मुस्लिम दुनिया की एकता का परिणाम है. उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में जेरुसलम का अनुमोदन दिखाता है कि मुस्लिम दुनिया एकता में क्या कर सकती है.

रविवार को सूडानी संसद को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, जेरूसलम पर आपातकालीन शिखर सम्मेलन के जरिए जो सफलता मिली. उसने यह साबित कर दिया गया है कि मुस्लिम दुनिया कितनी मजबूत हो सकती है जब वे मिलकर काम करते हैं”.

ध्यान रहे जेरुसलम को इजरायल की राजधानी घोषित करने वाले अमेरिका के फैसले के खिलाफ तुर्की और यमन द्वारा लाये गए प्रस्ताव के समर्थन में सयुंक्त राष्ट्र की आम सभा में 128 वोट पड़े थे. जबकि अमेरिका के समर्थन में केवल 9 देशों ने वोट किया था.

इसी के साथ उन्होंने रोहिंग्या मुद्दें का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा, “हम में से किसी को भी रोहिंग्या मुसलमानों की हत्याओं के बारे में चुप रहने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए, फ़लस्तीनियों को वर्षों से के उत्पीड़न का सामना करना पड़  रहा है, सीरिया, इराक, लीबिया, यमन और सोमालिया में मानवतावादी संकट है.

इस दौरान उन्होंने सूडान के राष्ट्रपति उमर अल-बशीर को इस्तांबुल में 13 अगस्त को आपातकालीन ओआईसी शिखर सम्मेलन में शामिल होने और जेरुसलम पर साथ देंने के लिए शुक्रिया किया.