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इस मुस्लिम शख्स ने मुफ्त में दान की किडनी, अब गरीबों के लिए चलाते हैं मुफ्त स्कूल

कहते हैं कि खुदा भी उसका साथ देता है जो खुद का साथ देता है. सैयदुल इस्लाम एक जीता जागता उदाहरण हैं, जिन्होंने साबित कर दिया कि जीवट हो तो हालात कितने भी मुश्किल हों आप खुद के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं. अप्रैल 2006 तक सैयदुल एक छोटे व्यापारी थे जिनका उल्लुबेरिया में चार लोगों का परिवार था. उनकी आय स्थिर आय थी लेकिन अप्रैल 2006 में सब कुछ बदल गया, जब राजनीतिक झड़पों के परिणामस्वरूप उसकी दुकान को पूरी तरह से जला दिया गया.

उनके पास कोई बीमा नहीं था और रातोंरात उसके पूरे जीवन की मेहनत जलकर खाक हो गई. आय का कोई अन्य स्रोत नहीं होने के साथ परिवार की वित्तीय स्थिति जल्द ही गंभीर हो गई. उसने एक बैंक के पास ऋण के लिए संपर्क किया ताकि वह फिर से दुकान शुरू कर सकें, लेकिन बैंक ने साफ इनकार कर दिया और जून 2006 में सैयदुल पैसे के लिए संघर्ष करने लगे.

सैयदुल ने बताया कि ऋण पर काबू पाने के लिए एक अख़बार में गुर्दे के विज्ञापन को देखने के बाद उसने अपने गुर्दे को बेचने का फैसला किया. उनका कहना था उन्हें विश्वास था कि इस प्रत्यारोपण के लिए मुझे 80,000 रुपये का भुगतान मिलेगा. उस समय हमारी वित्तीय स्थिति को देखते हुए, 80,000 रुपये एक बड़ी राशि थी. लेकिन जब सैयदुल ने उनकी (गुर्दा लेने वाले) की आर्थिक स्थिति देखी तो अपना गुर्दा मुफ्त में दान कर दिया.

यहां तक ​​कि एक समय में जब सोशल मीडिया अपने शुरुआती चरण में था तो समाचार जल्द ही वायरल हो गया था और विभिन्न स्थानीय अख़बारों और टीवी चैनलों द्वारा इसे उठाया गया था. उनकी उदारता के लिए उन्हें शहर से नागरिकों द्वारा कई उपहार और पुरस्कार प्राप्त हुए. कुछ ने उन्हें आर्थिक रूप से भी मदद की, हालांकि यह 80,000 रुपये के करीब भी नहीं थी. सैयदुल कहते हैं, ‘हमारी वित्तीय स्थिति में पुरस्कार और उपहार के साथ सुधार नहीं हुआ.

गुर्दा लेने वाले श्यामल सिंह का दुर्भाग्यवश एक दुर्घटना में कुछ साल बाद ही निधन हो गया, लेकिन उनकी पत्नी छाया सिंह और बेटी टीना सिंह कभी सैयद को नहीं भूले. सैयदुल उनके लिए भगवान का एक अवतार थे. इस घटना के लगभग 18 महीने बाद तत्कालीन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) सरकार ने सैयदुल की बहादुरी के लिए उन्हें राज्य के खेल मंत्रालय में एक सरकारी नौकरी दी. 2008 तक सईदुल को लगभग दो साल की अनिश्चितता के बाद एक स्थिर आय मिली थी.

अब उनके मन में शिक्षा को लेकर विचार आया और अपने क्षेत्र में गरीब बच्चों के लिए एक स्कूल शुरू किया जाए. वर्ष 2014 की शुरुआत में उनका सपना वास्तविकता में बदल गया. तब खेल मंत्री सुभाष चक्रवर्ती ने ‘दानवीर’ का खिताब दिया था. सैयदुल ने कहा कि गरीबी की वजह से मुझे अपनी माध्यमिक परीक्षा पूरी करने का मौका नहीं मिला लेकिन अब इस विद्यालय की वजह से मैं इन छात्रों को शिक्षा की सीढ़ी पर चढ़ने में मदद करके मेरा सपना जी सकता हूं. स्कूल के संचालन के तीसरे वर्ष में विद्यालय में कक्षा 1 से 8 तक लगभग 150 छात्र हैं. स्कूल में 8 कमरे, 8 शिक्षक हैं.