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कश्मीर हिंसा: कश्मीरी नागरिक ने भारत के प्रधान मंत्री को लिखा खत, पूछा सभी को कश्मीर की ज़मीन चाहिए लेकिन किसी को कश्मीर के लोगो की फ़िक्र नहीं

जहा पूरे विश्व में कश्मीर में हो रही हिंसा की चर्चा है, इस मुद्दे को लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका के राज्य विभाग के प्रवक्ता ने भी कश्मीर में अल्पसंख्यको पर हो रहे उत्पीड़न पर आवाज़ उठायी थी, लेकिन भारत की सरकार अपनी ख़ामोशी बनाये रखे हैं.

जिसको संज्ञान में लेते हुए अमेरिका के जॉर्जिया में रहने वाली मूल कश्मीरी निवासी तथा गैर भारतीय आवासीय फ़ातिमा शाहीन ने भारत के प्रधान मंत्री को एक पत्र लिखा हैं.

फातिमा ने इस पत्र में अल्पसंख्यक कश्मीरी जनता की आवाज़ को सुने जाने की अनुरोध किया है. फातिमा ने इस पत्र में लिखा हैं कि, आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी’ अगर हम कश्मीर के लोगों का ख़्याल करते हैं, तो हमें घाटी में संचार के साधनों को बंद कर देने का रास्ता नहीं ढूंढ़ना चाहिए, क्योंकि इस कार्य से वे स्वतंत्रता से वंचित हो रहे हैं.

फ़ातिमा ने अपने ख़त में लिखा है कि प्रधानमंत्री जी हमें कश्मीरी जनता की आवाज़ें सुननी चाहिए। क्योंकि कश्मीर के सभी लोग इसकी मांग कर रहे हैं.

उन्होंने आगे इस पत्र में लिखा है कि ‘मैं 20 जुलाई को अपने एक रिश्तेदार के यहां कश्मीर आई और मैंने घाटी को जिस हालात में पाया वैसा पहले कभी सुना भी नहीं था.’

फातिमा ने अपने पत्र के ज़रिये भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से कुछ सवाल किये हैं, उन्होंने पुछा है कि, “प्रधानमंत्री जी’  मैंने टीवी की ख़बरों को देखा है, फ्रांस के नीस शहर में हमला और तुर्की में हुए सैन्य विद्रोह के नाकाम प्रयास की ख़बरों को भी स्क्रीन पर जगह मिली है, इसके साथ ही दक्षिण भारत में बारिश की समाचार भी है, लेकिन कश्मीर की ख़बरें कहां हैं? महोदय, क्या यही कारण है कि मुझे कभी पता नहीं चल पाया कि इतने लंबे समय से मेरे शहर में क्या चल रहा है.”

फातिमा ने अपने पत्र में उन्होंने एक ऐसी बात लिखी जिसको पढ़ कर सभी की नाम हो जाएगी, फातिमा लिखती है कि “किसी को भी कश्मीर के लोगों का ख़्याल नहीं है, लेकिन हर कोई कश्मीर की ज़मीन चाहता है.”

हर कोई कश्मीर को चाहता है, लेकिन वहां रहने वाले लोगों का किसी को ख़्याल नहीं है, क्योंकि अगर हम कश्मीर के लोगों का ख़्याल करते, तो हम यह नहीं देखते कि लोग बुरहान वानी को आतंकी कह रहे हैं या शहीद. प्रधानमंत्री जी हमें यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि एक मेधावी छात्र ने क़लम ने बजाय बंदूक को क्यों चुना?

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