Home अरब देश परमाणु शक्ति बनने की राह पर सऊदी अरब

परमाणु शक्ति बनने की राह पर सऊदी अरब

जब से वैश्विक ताकतों के साथ ईरान का परमाणु समझौता हुआ है उस समय से सऊदी अरब के राजकुमारों को यह लग रहा है कि ईरान की ताक़त में बहुत तेज़ी से इजाफा हुआ है। ईरान से अपने गहरे तल्खी के चलते सऊदी सरकार ने ख़ुद को इजरायल से क़रीब करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी।

सऊदी अरब ने जब यह देखा कि विश्व की बड़ी ताकतें ने ईरान से परमाणु समझौता कर लिया है और बैन हटाने और रिश्ते बढ़ाने का सिलसिला शुरू हो गया है, सीरिया और इराक़ में सऊदी अरब ने जो बदलाव लाने की कोशिश की थी वह भी असफल हो गई है और आईएसआईएस का भी सफ़ाया हो चुका है तो अब रियाज़ सरकार के पास यही एक रास्ता बचा है कि परमाणु तकनीक प्राप्त करके ईरान का मुक़ाबला करे।

अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में परमाणु अप्रसार तथा बर्बादी के हथियारों के मामलों के निदेशक क्रिस्टोफ़र फ़ोर्ड ने बीते गुरुवार को कहा कि मुहम्मद बिन सलमान ने सऊदी अरब को परमाणु तकनीक से समृद्ध करने के विषय पर बातचीत के लिए उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल वाशिंगटन भेजा था। फ़ोर्ड ने कहा कि सऊदी अरब की इस मांग पर ट्रंप प्रशासन ने जो जवाब दिया वह मेरे लिए बहुत दुखद बात है।

उन्होंने सिनेट के सामने भी कहा कि ट्रंप प्रशासन ने परमाणु मामले में सऊदी अरब से बातचीत शुरू कर दी है जो अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के शासन काल में इसलिए रोक दी गई थी कि सऊदी अरब ने इस मामले में अमरीका की कठोर शर्तों को मानने से इंकार कर दिया था। यह शर्तें इस लिए लगाई गई थीं कि सऊदी अरब परमाणु कार्यक्रम को परमाणु हथियार बनाने के लिए प्रयोग न कर सके।

एक अमरीकी वेबसाइट ने भी एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें अमरीकी सांसदों ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जाहिर की है कि ट्रंप प्रशासन ने कड़ी शर्तों में कुछ नर्मी कर दी है जिसका नतीजा जंग की आग भड़क जाने के रूप में निकल सकता है। अमरीका के पूर्व अधिकारियों का कहना है कि बड़े अमरीकी अधिकारियों को सऊदी अरब की परमाणु तकनीक की मांग पसंद नही।

अमरीकी आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि ट्रंप के व्हाईट हाऊस में पहुंचने के बाद से परमाणु विषय में सऊदी अरब से दोबारा बातचीत शुरू हो चुकी है। माइकल फ़्लेन जब अमरीका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बने तो अमरीका में सऊदी लॉबी की बाछें खिल गईं और परमाणु मामले पर बातचीत तेज़ हो गई। बहरहाल फ़्लेन को पद छोड़ना पड़ा।

यह भी जानकारी है कि अमरीकी परमाणु कंपनियों के बीच सऊदी अरब में परमाणु संयंत्र के निर्माण के मुद्दे पर कंपटीशन चल पड़ा है। इतना ही नहीं रूस, दक्षिणी कोरिया और फ़्रांस की कंपनियां भी कंपटीशन के मैदान में कूद पड़े हैं। अब देखना यह है कि सऊदी अरब को परमाणु तकनीक मिल पाती है अथवा नहीं और यदि मिलती है तो किन शर्तों पर? मगर यह तो तय है कि यह रास्ता आसान नहीं है।