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काबा शरीफ और हज: कैसे हुआ काबा का निर्माण और शुरू हुई हज यात्रा

सऊदी अरब स्थित पवित्र स्थल मक्का हमेशा से मुस्लिमों की आस्था का केंद्र रहा है. दुनिया भर के सभी मुस्लिम अल्लाह की इबादत के लिए दिन भर में 5 बार काबा की ओर मुंह करते और नमाज़ पढ़ते हैं. इस्लाम के पांचवें स्तम्भ यानि हज के लिए हर साल दुनिया भर से हज़ारों-लाखों मुस्लिम सऊदी अरब जाते हैं. हज एक पवित्र आध्यात्मिक यात्रा है जो ज़िन्दगी में कम-अज-कम एक मर्तबा हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है. हज हर साल इस्लामी केलिन्डर के 12वें और आखिरी माह धू अल हिज्जाह की 8वीं से 12वीं तारीख तक किया जाता है.

कुरआन पाक में कहा गया है कि हज हज़ारों साल से चला आ रहा है. यह पैगम्बर इब्राहीम के समय से चल आया रहा है. अल्लाह ने पैगम्बर इब्राहीम को हुक्म दिया कि वह अपनी बीवी हज़र और बेटे इस्माइल को मक्का के रेगिस्तान में थोड़े से खाने-पानी के साथ अकेला छोड़ दें. उन्होंने ऐसा ही किया. कुछ ही वक़्त में उनका खाना-पानी ख़त्म हो गया. हज़र पानी की तलाश में रेगिस्तान में भटकती रहीं. इस दौरान उन्होंने 7 बार अल-सफा से अल-मारवाह की पहाड़ियों के बीच सफ़र किया लेकिन पानी तलाशने में कामयाब ना हो सकीं. नाउम्मीदी से भारी हज़र जब वापस लौटीं तो उन्होंने देखा कि नन्हा इस्माइल अपने पैर से ज़मीन पर वार कर रहा है और उस वार से पानी का सोता फूट पड़ा.

कई सालों बाद अल्लाह ने इब्राहीम को काबा का पुनर्निर्माण कराने का आदेश दिया. तब पैगम्बर इब्राहीम और उनके बेटे इस्माइल ने काबा शरीफ की नींव उठायी. इस्लामी विद्वान शिबली नोमानी ने उल्लेख किया है कि पैगम्बर इब्राहीम ने 27 फुट ऊंची, 96 फुट लम्बी और 86 फुट चौड़ी ईमारत बनायी. उन्होंने काबा के पूर्वी कोने में एक काला पत्थर लगाया. अल्लाह ने ही पैगम्बर इब्राहीम को कहा कि उन्हें दुनिया भर के लोगों को काबा की यात्रा के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए.

काबा के निर्माण के बाद पैगम्बर इब्राहीम ने हर साल काबा शरीफ की यात्रा करना जारी रखा और उनके इंतकाल के बाद उनके बेटे इस्माइल ने भी ऐसा ही किया. हालांकि वक़्त बीतने के साथ-साथ हज रिवाज़ में बदल गया. अब हर साल हज के लिए जाने वाले यात्री लाखों लोगों के जुलूस में शामिल होते हैं.

सभी हज यात्री एक साथ हज के हफ्ते में मक्का में जमा होते हैं और यहाँ पर कई रस्मों में हिस्सा लेते हैं. हर एक हज यात्री काबा के चारों ओर सात चक्कर काटता है, अल सफा और अल मारवाह पहाड़ियों के बीच आगे और पीछे चलता है, ज़मज़म के कुएं का पानी पीता है, अराफात पर्वत के मैदानों में जाता है और शैतान को पत्थर मारने की रस्म पूरा करने के लिए पत्थर फेंकता है. उसके बाद हज यात्री अपने सर मुंडवाते हैं, क़ुरबानी की रस्म पूरी करते हैं और इसके बाद ईद उल-अजहा मनाते हैं.