आज मुहर्रम उल-हराम की दस तारिख हैं या आम भाषा में इस दिन को अधिकतर लोग यौमे अशुरा के नाम से जानते हैं. यह वही दिन हैं जब पैग़म्बर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद सलल्लाहो अलह वसल्लम के नवासे और हज़रत इमाम हुसैन अलह सलाम की शहादत हुई थी.

आज ही के दिन इमाम हुसैन को करबला में यज़ीदियों ने क़त्ल कर दिया था. लेकिन इमाम हुसैन ने यह क़ुरबानी अपने नाना जान के लिए दी यानि हज़रत मोहम्मद सलल्लाहो अलह वसल्लम के लिए और उनकी उम्मत के लिए. तभी तो एक शायर लिखता हैं, “हम रहे या ना रहे नाना हुज़ूर हश्र तक आपकी उम्मत की शफात होगी.”

screenshot_11इमाम की शख्सियत वो थी जिसने इस्लाम को वाज़े किया कि इस्लाम धर्म किया दरस देता हैं. उन्होंने मज़लूमियत के आलम में जंग लड़ी. यज़ीदी लश्कर बेशुमार था और इमाम हुसैन के खेमे में बस 72 लोग.

तभी तो भारत में आज़ादी की नीव रखने वाले और राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी इमाम हुसैन के बारे में लिखते हैं कि “मैंने हुसैन से सीख हैं कि मज़लूमियत में किस तरह जीत हासिल की जा सकती हैं, इस्लाम की तरक्की तलवार पर निर्भर नहीं करती बल्कि यह इमाम हुसैन के बलिदान का नतीजा हैं. जो एक महान संत हैं.”

Indian leader, Mahatma Gandhi, said: “I learnt from Hussain how to attain victory while being oppressed.”
Mahatma Gandhi’s first Salt Satyagrah was inspired by Imam Hussain’s non violent resistance to the tyranny of Yazid. Gandhi is said to have studied the history of Islam and Imam Hussain (A), and was of the opinion that Islam represented not the legacy of a sword but of sacrifices of saints like Imam Hussain (A).

Mahatma Gandhi writes:“My faith is that the progress of Islam does not depend on the use of sword by its believers, but the result of the supreme sacrifice of Hussain (A), the great saint


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